अब मध्यप्रदेश सरकार विकास के नाम पर यदि ज़मीन अधिग्रहीत करती है तो उसके एवज में मुआवजा नहीं देगी। इसके बदले में ज़मीन के मालिक को विकास अधिकार प्रमाण पत्र दिया जाएगा जिसके ज़रिए मालिक सरकार द्वारा चिन्हित जगहों पर ही फिर से अपना घर बना पाएगा।
नई दुनिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य सरकार ने हस्तांतरणीय विकास अधिकार नियम का मसौदा जारी किया है। राज्य सरकार इसके अंतर्गत मेट्रो और अन्य विकास कार्यों के लिए ज़मीन अधिग्रहण करेगी।
इस मसौदे के तहत शहर को दो हिस्सों में बांट दिया गया है, एक उत्पादन क्षेत्र और दूसरा प्राप्ति क्षेत्र। उत्पादन क्षेत्र वो होगा जहां सरकार ज़मीन अधिग्रहण करेगी और प्राप्ति क्षेत्र वो होगा जिसके लिए ज़मीन मालिक को विकास अधिकार प्रमाण पत्र दिया जा रहा है।
इस मसौदे में बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है कि सरकार जो निमार्ण योग्य भूमि देगी वो कहां देगी। यदि ज़मीन मालिक को यह क्षेत्र पसंद न आए तो वो कहां आपत्ति दर्ज करेगा।
गौरतलब है कि जो प्रमाणपत्र दिए जायेंगे वे सब सिर्फ 10 वर्षों के लिए वैध होंगे| राज्य सरकार द्वारा जारी हस्तांतरणीय विकास अधिकार नियम में एक प्रावधान यह भी है कि यदि प्रमाणपत्रधारक ने इन 10 सालों में इसका इस्तेमाल नहीं किया या नहीं बेचा तो वह प्रमाणपत्र अवैध हो जाएगा।
इससे समस्या यह है कि अगर ज़मीन मालिक 10 वर्षों के भीतर इसका इस्तेमाल नहीं कर पाया तो फिर ज़मीन भी चली जायेगी और पैसे भी नहीं मिलेंगे। इसके अलावा इसमें सबसे ज़्यादा समस्या उन लोगों को होगी जिनके पास अन्य कोई ज़मीन नहीं है| ऐसे व्यक्तियों के पास अपना विकास अधिकार प्रमाणपत्र बेचने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा।
अब ऐसे में वह कब और कैसे बिकेगा इसका भी कोई ठोस उपाय नहीं है क्योंकि इस मामले में सरकार का कोई ज़्यादा दखल नहीं है।